मेहनत बनाम भाग्य - मेरी कलम से - गैंदलाल पी साहू


मेहनत बनाम भाग्य, गैंदलाल साहू


मेहनत बनाम भाग्य


ये बात तो जरूरी सुनी होगी "बीरबल अत्यधिक विद्वान होने के बावजूद कभी राजा नहीं बन सका।" जी हां, दरअसल मेहनत और भाग्य एक ही सिक्के के दो पहलू है, दोनों में से किसी एक के बिना परिणाम या तो नहीं मिलता या तो विपरीत मिलता है या तो कुछ क्षण के लिए धोका से मिलता है।

मॉडर्न लोग यूँ कहें तो आजकल के युवा लोग भाग्य पर विश्वास नहीं करते, है ना। पर करना चाहिए पता है क्यों , चलिए कुछ ऐसी वास्तविक घटना से भिज्ञ हो लेते हैं -

1. एक आदमी आईएएस के लिए जरूरी रैंक लाकर भी उसके नीचे रैंक वाला आईएएस बना, पता है क्यों, क्योंकि उसके दस्तावेज में त्रुटि निकल गया।

2. गाड़ी चला रहे हैं अचानक सामने में जानवर आ गया, दुर्घटना हो गया। अब आप मेहनत को दोष दोगे या किस्मत को।

3. किसी व्यक्ति का रेलवे के अच्छे पद पर चयन हुआ। दस्तावेज सत्यापन भी हो चुका। उसी दिन घर वापस आते समय अपनी मोटरसाइकिल से गिर गया, उसका पैर टूट गया। अब वह मेडिकल सर्टिफिकेट में अनुत्तीर्ण हो गया। परिणामस्वरूप वह रेलवे के जॉब से हाथ धो बैठा।

ऐसी ही कई उदाहरण हैं जो मेहनत और भाग्य के तालमेल न बैठने की वजह से उस कार्य में असफल हुए हैं।

अब आप कहेंगे गीता में तो केवल कर्म करने को प्रधान दी गयी है । जी हां, कर्म करने का मतलब यह बिल्कुल नहीं कि वृद्ध व निस्सहाय याचक के फैलाए हाथ को नजरअंदाज कर एक रूम में दुबककर दिनरात पढ़ना या अमीर बनने के लिए खूब इधर-उधर भटकना।

कर्म अर्थात सुकर्म अर्थात अच्छे कार्य अर्थात मेहनत भी किया जाए और मन में सहनशील, संवेदनशील व सेवा भाव भी हो। आप जो दूसरों की सेवा करते हो, उनकी दुवाएं ही आपके लिए भाग्य निर्मित करती है।

"मैं मेहनत पर तिगुना विश्वास करता हूँ तो वहीं एक चौथाई भाग्य पर भी।"
           - गैंदलाल पी साहू

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