नन्हीं फूल-सी बिटिया, प्यारी-सी गुड़िया

हाथ नहीं कांपे उन राक्षषों के, जिंदा जला दिया जाए फिर भी सजा अधूरी ही रहेगी ।


अलीगढ़ में घटित बेहद ही हृदय विदारक घटना, शायद ही इतिहास में ऐसा हुआ हो। भगवान बच्ची की परिवार को इस दुख को सहने की शक्ति दें। 2 साल की मासूम बच्ची की निर्मम हत्या करने वाले उन हैवानों को भी तड़पा-तड़पा कर मार देना चाहिए, ऐसा हम आप सब के रोष में हैं। 

परंतु दुख इस बात का है कि हैवानों को फांसी देने के लिए भी हमारे संविधान के कई नियम कानून रोड़े डालेंगे। अगर आरोपी ने जुर्म कबूल लिया तो भी अदालत इसका सबूत मांगेगा (सबूत जुटाने में पुलिस को काफी मसक्कत करना पड़ता है), सबूत मिल जाए तो आरोपियों का स्वास्थ्य परीक्षण होगा मानों उसको सेना में भर्ती करना हो। स्वास्थ्य ठीक हो तो तारीख मिलेगा अन्यथा इलाज चलेगा। फिर सजा सुनाई जाएगी । फिर ऊपरी अदालत में अपील, फिर तारीख, फिर ऊपरी अदालत में अपील। 

फिर कोई राजनीति पार्टी के लोग उसके सपोर्ट में आएंगे जैसे कसाब और अफजल के समर्थन में आये थे। फिर दया याचिका । इस सब से गुजरकर अगर फांसी हुई तो अफसरों को यह ख्याल रखना होगा कि उनका किसी प्रकार का शोषण न हो, सुकून से फांसी दें, चाहे वह कितना भी हैवानियत जुर्म किया है। ( पता नहीं नियम बनाने वालों को इन मामलों पर इंसानियत की क्यों जरूरत पड़ी होगी) ।

 ये भी क्या नियम, मुझे नहीं मालूम इन नियमों को किस हिसाब से बनाया होगा। मेरे हिसाब से, अगर आरोपी ने जुर्म कबूला तो तुरंत सजा दो (यह सुझाव नहीं है ) ।

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