जन्मजात रोग और इसके प्रकार | जीव विज्ञान सामान्य ज्ञान पीडीएफ डाउनलोड

प्रतियोगी परीक्षाओं में जीव विज्ञान से सम्बंधित महत्वपूर्ण अध्याय जन्मजात रोग और इसके प्रकार से अनेक प्रश्न पूछे जाते है. जन्मजात रोग के प्रकार बहुत हैं जो काफी इम्पोर्टेन्ट होते हैं कम्पटीशन परीक्षा के लिए. अगर आप भी सरकारी नौकरी भर्ती के लिए तैयारी कर रहे हैं और प्रतियोगी परीक्षा देना चाहते हैं तो यह लेख आपके मददगार साबित होगा.


रुपरेखा


जन्मजात रोग क्या है?


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वे रोग जो जन्म के समय ही शरीर को ग्रसित करता है अथवा जन्म के पूर्व अर्थात माता के गर्भ से ही उनके गुणसूत्र या पोषक तत्व की कमी की वजह से शिशु को होने वाले रोग को जन्मजात रोग कहते हैं. 


जन्मजात रोग वह रोग है जो जन्म से ही इन्सान के शरीर में किसी भी प्रकार का पोषक तत्व की कमी और हार्मोनल समस्या से वह अस्वस्थ रहता है अथवा वे कारण जो आंशिक या पूर्णकालिक विकलांगता का कारण बनता हो.


जन्मजात रोग प्रायः स्थाई होते हैं और इसका इलाज करना संभव नहीं रहता. वैसे जन्मोपरांत कुछ रोग ऐसे होते हैं जिसका तुरंत इलाज किया जाये तो इस रोग का निवारण किया जा सकता है. अन्यथा अधिकतर जन्मजात रोग जीवनभर के लिए शरीर में बना रहता है.


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जन्मजात रोग के प्रकार

जन्मजात रोग उनके लक्षण, इलाज, वाहक और समस्या के आधार पर कई तरह के होते हैं. जन्मजात रोग के प्रकार निम्नलिखित है-

  • वर्णान्धता
  • पटाऊ सिंड्रोम
  • टर्नर सिंड्रोम
  • डाउन सिंड्रोम
  • हीमोफीलिया
  • क्लाइनफेलटर सिंड्रोम


1. वर्णान्धता

वर्णान्धता को अंग्रेजी में कलर ब्लाइंडनेस कहते हैं. वर्णान्धता से पीड़ित व्यक्ति लाल, हरा और नीला रंग को पहचान पाने में असमर्थ रहता है. इस रोग से पीड़ित को सफेद-काला रंग आसानी से पहचान आ जाता है लेकिन लाल, हरा और नीला तथा इनसे बनने वाले रंगों को भी पहचानने में कठिनाई होती है अथवा पहचान ही नहीं पाता. अगर उसे काला और हरा रंग को पहचाने कहा जाये तो वह दोनों कलर को काला कहेगा. 


वर्णान्धता का कारण व लक्षण

जब किसी वस्तु पर प्रकाश पड़ती है तो उससे टकराकर प्रकाश हमारी ओर आँखों में आती है जिससे वह वस्तु हमें दिखाई देती है. रेटिना की दीवार में राड्स और कॉन्स आकार के कोशिका होते हैं, इनका काम भिन्न होता है. राड्स कोशिका सफेद और काला रंग के लिए उत्तरदायी है, वहीं कॉन्स कोशिका रंगीन के लिए.


कॉन्स कोशिका का कार्य परावर्तित प्रकाश तरंगदैर्ध्य में विद्यमान रंग लाल, हरा और नीला का पहचान कर इसकी सूचना मस्तिष्क को देना है. चूँकि जब कॉन्स कोशिका यह कार्य करने में असफल रहता है तो यह वर्णान्धता का कारण बन जाता है. या सीधा-सीधा कहा जाए तो वर्णान्धता के लिए जिम्मेदार रेटिना सही तरीके से कार्य नहीं करती तो वर्णान्धता रोग हो जाता है.


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वर्णान्धता एक आनुवंशिक रोग भी हो सकता है. वर्णान्धता महिलाओं की तुलना में पुरुषों को अधिक रहता है. इसका कारण यह है कि रंगों को पहचान पाने के लिए उत्तरदायी तत्व फोटोपिग्मेंट्स एक्स X क्रोमोसोम्स में पाया जाता है. 


अब चूँकि महिलाओं की शरीर की संरचना XX क्रोमोसोम्स के गुणसूत्र से मिलकर बने होते हैं, अगर किसी एक X क्रोमोसोम्स में फोटोपिग्मेंट्स की कमी हो तो दूसरे X क्रोमोसोम्स से इसकी पूर्ति की जा सकती है. परन्तु पुरुष का शरीर XY क्रोमोसोम्स से बने होने के कारण इसके X क्रोमोसोम्स में फोटोपिग्मेंट्स की कमी हो तो इसकी पूर्ति नहीं की जा सकती और यह वर्णान्धता का कारण बन जाता है.


वर्णान्धता के कारण में से एक कारण है उम्र का बढ़ना. उम्र बढ़ने के साथ रंगों को पहचान सकने वाली कोशिकाओं और रेटिना कमजोर होती जाती है. इसके अलावा दवाइयों का अधिक / अनुचित सेवन भी वर्णान्धता का कारण हो सकता है.


अगर किसी भी रंग को वास्तविक तरीके से पहचान पाने में परेशानी हो रही है अथवा पहचान नहीं प् रहे हैं अथवा किन्ही दो से अधिक रंगों के अंतर स्पष्ट नहीं कर पाना वर्णान्धता का लक्षण है.


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वर्णान्धता का इलाज

वैसे तो अभी तक वर्णान्धता यानि कलरब्लाइंडनेस का कोई इलाज नहीं है, यह लाइलाज बीमारी है. फिर भी इलेक्ट्रिक आंख और कृत्रिम रंगीन लेंस की मदद से वर्णान्धता से कुछ हद तक छुटकारा प् सकते हैं.


2. पटाऊ सिंड्रोम

पटाऊ सिंड्रोम शरीर के अनेक भागों को प्रभावित करता है. इससे संक्रमित मनुष्य का ऊपरी होंठ फट जाता है व तलुए में दरार पड़ जाता है. मानसिक संतुलन बिगड़ना और मंदबुद्धि होना भी पटाऊ सिंड्रोम का कारण है.


3. टर्नर सिंड्रोम

टर्नर सिंड्रोम को 45X या 45X0 के नाम से भी जाना जाता है. टर्नर सिंड्रोम महिलाओं में ज्यादा होते हैं. इससे संक्रमित महिला के शरीर में से X क्रोमोसोम्स पूरी तरह नष्ट हो जाता है. इससे पीड़ित व्यक्ति की औसत से कम बुद्धि व देखने की क्षमता कम होती है.


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4. डाउन सिंड्रोम

डाउन सिंड्रोम की पहचान ट्राइसोमी 21 के रूप में होती है. यह भी अनुवांशिक समस्या है. डाउन सिंड्रोम से पीड़ित में बुद्धि औसत से कम, छोटा कद, शारीरिक विकास में देरी आदि लक्षण होता है.


5. हीमोफीलिया

हीमोफीलिया अनुवांशिक रोग है. पुरुषों की तुलना में महिलाओं में हीमोफीलिया होने की संभावना कम रहती है. इस रोग में मनुष्य के शरीर के ऊपरी हिस्सा से रक्त बहना रुकता नहीं व रक्त का थक्का बनने की क्रिया नहीं होती. हीमोफीलिया रोग से ग्रसित व्यक्ति को तब ज्यादा परेशानी होती है जब वह दुर्घटना का शिकार होता है और रक्त लगातार बहता रहता है.


रक्त के लगातार बहते रहने और थक्का नहीं बनने से शरीर में रक्त की रक्त की कमी से व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है. हीमोफीलिया का कारण एक प्रोटीन की कमी होना है जिसका नाम क्लॉटिंग फैक्टर है. क्लॉटिंग फैक्टर नामक प्रोटीन रक्त में थक्का जमाने का कार्य करता है.


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हीमोफीलिया से बचाव

हीमोफीलिया से बचाव करने के लिए शरीर के बहुत ध्यान रखने की जरूरत होती है. चूंकि इस बीमारी में शरीर के ऊपरी सतह पर स्त्रावित हो रही रक्त का थक्का नहीं बनाता इसलिए कोशिश करनी चाहिए कि किसी भी अंग किसी भी प्रकार से चोट न पहुंचाएं, जिससे रक्त स्त्राव होगा ही नहीं. हीमोफीलिया से बचाव या बचने के लिए निम्नलिखित टिप्स फॉलो करें-

  • ऐसी कोई भी गतिविधियां करने से बचना चाहिए जिससे शरीर पर चोट लगने की संभावना हो.
  • मसूड़ों की अच्छी तरह साफ-सफाई करना चाहिए.
  • नियमित प्राणायाम करना चाहिए जिससे मन शांत रहेगा और शारीरिक चोट से बच सकेंगे।
  • यह लाइलाज रोग है इसलिए कोई भी दवा का सेवन करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना चाहिए।


हीमोफीलिया का आयुर्वेदिक उपचार

हीमोफीलिया का इलाज के लिए इंजेक्शन का आविष्कार हो चुका है, लेकिन यह सुविधा कुछ चुनिंदा अस्पताल में ही उपलब्ध होता है। हीमोफीलिया का आयुर्वेदिक उपचार के लिए अब तक सटीक अध्ययन नहीं हुए है और न ही इसके लिए प्रमाणित आयुर्वेदिक इलाज व उपचार का पता चला है।

हीमोफीलिया से बचने के उपाय यही है कि अगर चोट लगी हो तो चोट वाली जगह को कसकर पट्टी बांध देना चाहिए। अगर मुँह से रक्त स्त्राव हो रहा है तो बर्फ का छोटा टुकड़ा मुंह में रखना चाहिए।


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6. क्लाइनफेलटर सिंड्रोम

क्लाइनफेलटर सिंड्रोम भी अनुवांशिक रोग है. यह सिंड्रोम महिलाओं की तुलना में पुरुषों को ज्यादा प्रभावित करता है. नवजात शिशु में गुणसूत्र के अतिरिक्त मात्रा उपस्थित होने की वजह से यह समस्या होती है. क्लाइनफेलटर सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति के शरीर से बाल न निकलना, वृषण के विकास में अवरुद्ध होना, शरीर की लम्बाई का अधिक बढ़ना आदि समस्या होती है.


उपरोक्त लेख जन्मजात रोग और इसके प्रकार हैं. इसका पीडीएफ जल्द ही अपलोड कर दिया जायेगा.

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