गगन और दिवाकर एवं उनकी विचारधारा
चिलचिलाती धूप, उत्तरायन से दक्षिणायन के समीप पहुँच चुकी सूर्य और मौसम आम के, इस बीच गाँव के बगल में बगीचे जहाँ अठखेलियाँ करती कई सारे आम के पेंड़ और उसमें लगे फल. आम के फलों को पत्थरों से निशाना लगाकर गिराते गगन और दिवाकर, जो 13 वर्ष की उम्र के पड़ाव पर था. दोनों की गहरी दोस्ती और उसका मकान भी सटा हुआ. एक से अधिक बार निशाना लगाने पर एक आम का शिकार हो जाये वही बहुत है क्योंकि दोनों की बांहे छोटी और लक्ष्य ऊपर था, निशाना लगते ही दोनों के चेहरे पर मुस्कुराहट और पड़ने वाली सीलन और भी निशाना लगाने के लिए उत्सुक करते. उनके निक्कर जोकि पीछे से फटी हुई है, की जेब भरते ही पास स्थित मंदिर प्रांगन में दोनो जाकर आम के स्वाद का मजा लेते.

ग्रीष्म ऋतू फलों के लिए अनुकूल है, इस समय कई फल पककर खाने लायक तैयार होते हैं, चूँकि गाँव जंगलों में आम, चार, गंगाइमली, तेंदू जैसे फल बहुतायत में देखने को मिलता है, गगन और दिवाकर इन सभी फलों को गिराते तोड़ते और खूब आनंद लेते. भरी दोपहरिया को फलों का और संध्या को खेलों का. दरअसल बचपन में खेले जाने वाले खेल भी फलों की तरह मौसमी होते हैं, गर्मी में डिब्बी-बांटी और ठंड में भंवरा-फोटो. दोनों के जेब किसी न किसी खेल सामग्री से भरा होता था, अगर घर से 1 रुपया मिल जाये तो एक ओर के जेब मिच्चर से भर जाता और दोनों बांटकर खा लेते. चूँकि दोनों के घर सटा हुआ था, बराबर बिरादरी के, धर्म और संस्कृति भी एक, ऐसे में गगन और दिवाकर एक दुसरे के घर में ऐसे रहते मानों सगा भाई. एकदम निःसंकोच. सुबह होते ही फटे निक्कर जो घुटनों के ऊपर तक था, पहनकर कभी गगन दिवाकर को तो कभी दिवाकर गगन को बाहर खेलने की बात कहकर घर से बाहर निकल पड़ते. कभी जीतते तो कभी हारते. जीतने पर कुछ खेल सामग्री बेचकर मिच्चर लेते व अपने अपने जेब भरते और खाते घूमते. प्राथमिक, माध्यमिक से लेकर इंटरमीडिएट तक की विद्यालयीन सफ़र भी दोनों साथ में एक ही विद्यालय में रहकर पूरा किया.

जैसे-जैसे उम्र गुजरते जाते हैं इंसानों की हाव-भाव और विचार भी बदल जाते हैं. दोनों अपनी परिपक्वता चरण पर पहुँच चुके थे आखिर उनकी उम्र 22-23 हो चली थी. अब भी दोनों के घरों की स्थिति दयनीय, बचपन के वही कच्चे मकान और आर्थिक दिक्कत अलग. दिवाकर को मिलाकर परिवार में कुल 6 भाई थे. चूँकि गगन का दिवाकर के घर आना जाना था तो उसे एक साल से अधिक समय से इस बात का आभास था कि उसके एक भाई का किसी विदेशी विचारधारा (धर्म) की ओर झुकाव है और उसका पालन भी करता है और उसे अपनाकर मानता भी है, वह अपने पड़ोसियों के घर कोई समस्या होने पर प्रार्थना करने जाता. कुछ समय बाद दिवाकर के पिता भी उस विचारधारा के पवित्र स्थल पर जाने लगे या कहें कि वह भी इसे अपना लिया है, ऐसी मान्यता है कि वहां जाने से कई रोग ठीक हो जाते हैं हालांकि मानसिक रोग के अलावा बाकी रोग ठीक नहीं होते।

गगन को पता था दिवाकर के पिता पाचन संबंधी व अन्य समस्या से पीड़ित है और इनके इलाज के लिए कई प्रयास किए जा चुके हैं, एक बार वह खुद उन्हें कुछ आर्थिक मदद किया था. गगन संकोची किस्म का युवा और जिस माहौल में, समाज में पालन-पोषण हुआ, जिस मान्यता, रिवाज, संस्कृति व विचार वाले स्थान पर रहा इसका उस पर गहरा प्रभाव था. दिवाकर के भाई व पिता के विदेशी विचारधारा अपनाने के बावजूद गगन का दिवाकर के घर उठना बैठना वैसा ही था जैसा पहले. गगन इस विदेशी विचारधारा से संबंधित इतिहास से परिचित था कि कैसे इस विचारधारा के लोगों ने एक अन्य विचारधारा के अनुयायियों के साथ बर्बरता से पेश आया और लाखों करोड़ों की संख्या की आबादी की निर्ममता से हत्या कर दिया था वह भी इसलिए क्योंकि इनके ईश्वर को मारने में उन समुदाय के लोगों के हाथ थे। इस बात को लेकर अगर उन लोगों से इतनी ही नफरत थी उसके एक ही पीढ़ी को सजा देते लेकिन ऐसा नहीं बल्कि 1940 वर्षों तक उन समुदाय के लोगों के साथ अन्याय किया व हत्या करते रहे. अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद ऐसी घटनाओं में या तो कमी आई या तो बंद हो गए.

खैर यह अलग बात है कि यहां के लोग इस विदेशी विचारधारा को शांति और सुकून के लिए अपना रहे हैं. इसी विचारधारा के विवाद के कारण गांव में जनसभा आयोजित की गई थी, जिसमें इसे मानने वाले लोगों को बुलवाकर उनसे ऐसा करने का कारण जाना गया. दुर्भाग्य से इस जनसभा में दिवाकर के परिवार भी इसकी चमत्कारिक बातों के बखान कर रहे थे. ऐसा करके गांव में वह अपनी अलग पहचान बना दी जिसे बहुमत नकारता है. इन लोगों के प्रति कई भ्रम फैला दी गई जैसे- इन से मेल-मिलाप करने पर अमुक राशि की जुर्माना वगैरह. इसी डर से गगन के दादा ने उन्हें दिवाकर के घर कुछ दिन तक ना जाने या संभल कर जाने की बात कह दी थी. चौक चौराहों पर भी इस विचारधारा को अपनाने वाले लोगों को लेकर कई बातें कही जा रही थी, जैसे इसमें जुड़ने पर काफी धनराशि मिलती है, फलां व्यक्ति ने जो संपत्ति खरीदी वह इसी विचारधारा में जुड़ने पर मिला होगा वगैरह. वैसे दिवाकर के परिवार ने भी इस दौरान एक संपत्ति खरीदी थी तो लोग ऐसा ही समझ रहे थे.

यह सब वाक्या होने के बावजूद गगन दिवाकर के घर ना तो जाना छोड़ा और ना ही रिश्ते में कुछ खटासपना होने दिया क्योंकि वह दिवाकर के परिवार के सदस्यों की शारीरिक हालात से वाकिफ था. इस दौरान दिवाकर के जाति के ही लोग और उसके करीबी दोस्त भी गगन से यह आग्रह करते कि वह उसके घर वालों को समझाएं और ऐसा न करने को कहें. हालांकि गगन अप्रत्यक्ष रूप से दिवाकर को यह संकेत देने की कोशिश करता कि वह सही तो है परंतु सामाजिक रूप से वह गलत कर रहा है. गगन को तब झटका लगा जब वह एक दिन उसके घर पर गया पर नहीं मिला, घर में पूछने पर पता चला वह भी विदेशी विचारधारा के स्थल गया हुआ है और वह भी इस विचारधारा को मानने लगा है. गगन और उसके मित्रों ने दिवाकर को दूरभाष पर संपर्क किया तो झूठ बोला वह खेत में है. अब गगन को और धक्का पहुंचा और सोचा कि जिस विचारधारा में झूठ बोलना पाप है और हमेशा सत्य बोलने के लिए सिखाया जाता है, वहीँ दिवाकर इस विचारधारा को मानते हुए भी अपने सबसे करीबी दोस्तों से झूठ कैसे बोल सकता है.

इससे पहले दिवाकर अपने इस बारे में कभी किसी से साझा तक नहीं किया था. दिवाकर के इस कृत्य से स्तब्ध गगन उनसे दूरी तो नहीं बनाया परंतु उसके घर जाना या तो बंद कर दिया या बहुत कम कर दिया, यह सिर्फ इसलिए क्योंकि दिवाकर को संदेश देना था कि वह अपनी सांस्कृतिक व सामाजिक मूल्यों के विपरीत कर रहा है जो कि गलत है और एक पढ़े-लिखे व समझदार व्यक्ति को यह शोभा नहीं देता परंतु हुआ इसके विपरीत. उस विचारधारा के रक्षक नए जुड़ने वाले लोगों का ऐसा ब्रेनवाश करते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए उसे कितना भी समझा लो, ब्रेनवाश करते समय जो बात बताई जाती है उसे कभी नहीं भूलते. गगन को इस बात ने भी स्तब्ध किया कि दिवाकर कभी अपने पहले वाले विचारधारा के स्थल में इतना तन मन से पूजा पाठ नहीं किया, गीता नहीं पढ़ा और वहां जाकर विदेशी विचारधारा को पूरा जद्दोजहद से मान रहा है. खैर जब इंसान कुछ नया चीज देखता है तो उसमें मोहित होता ही है.

दिवाकर के विदेशी विचारधारा के मानने को उसके ही मित्रगण विरोध करते हैं और पीठ पीछे उसकी निंदा करते हैं. उसके कुछ मित्र तो गगन पर ही यह भार डाल देते हैं कि वह उसे समझाएं. दिवाकर के इस कृत्य को लेकर गगन अपने एक मित्र के साथ उसका बहुत मजाक उड़ाया था हालांकि गगन यह गलत कर रहा था और उसे इस चीज को लेकर बाद में अफसोस हुआ और अब वह किसी की पीठ पीछे बुराई करने से बचता है. इस घटना का नतीजा हुआ यह कि गगन और दिवाकर में बोली नोकझोंक के बाद बात करना और एक दूसरे के घर जाना पूर्णतः बंद हो गए। यह दिवाकर की ओर से उठाया गया अटपटा कदम था। जब कोई इंसान किसी इंसान पर पहले से ही चिढ़ा हुआ हो और वह कुछ अनबन कर दे तो यही हाल होती है। दिवाकर से उसके सभी दोस्त यह उम्मीद रखते हैं कि वह ऐसा ना करें और अपने पिछले विचारधारा को माने। हां घर में जिन्हें कुछ समस्या है और वहां जाकर ठीक हो सकता है तो जरूर भेजें और जाना भी चाहिए।

गगन भारतीय संस्कृति प्रेमी होने के साथ-साथ सनातन धर्म विचारधारा के अनुयाई है, अमूमन जैसे बाकी सामान्य लोग होते हैं. वह अपने ऊपर इन चीजों को बिना दिखावे के अनुसरण करता है. उनकी बात आलोचनात्मक होती है या कह सकते हैं आईना दिखाने वाली. इनका शौक था इंटरनेट में नई-नई जानकारी वाली लेख पढ़ना व अध्यात्मिक विषय पर भी थोड़ा बहुत फोकस करना. हालांकि अपने ऊपर आध्यात्मिकता का रंग ना दिखने देता. मित्र दिवाकर से इनका घनिष्ठ संबंध तो था ही, साथ में परिवारिक स्तर पर भी अच्छा संबंध था, मुश्किल समय में एक दूसरे का हाथ बढ़ाते, किसी भी समस्या को दोनों निपटा लेते, एक दूसरे के घर उठना बैठना.

गगन अवश्य सनातनी विचारधारा का था लेकिन वह किसी शारीरिक मानसिक परेशानियों को दूर करने के लिए जो भी उपाय हो अपना लेने की सोच रखता था. गगन इस चीज को समझता था कि लोगों को अपनी कष्ट निवारण के लिए कहीं भी जाना हो चले जाएं और ठीक होने के बाद वापस आ जाए. उनका यह भी मानना था कि अपना जिससे भी से पहचान है वह नहीं खोना चाहिए क्योंकि ऐसा होने पर समाज (सभी वर्गों) पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता ही है, साथ ही उनका अपना चाहने वाले के मन में एक अजीब वीभत्स विचार उसके प्रति पनपने लगता है. हालांकि वह इस चीज को लेकर कभी शिकायत नहीं करेंगे क्योंकि ऐसा करेंगे तो संभव है वह नाराज हो जाए या गुस्सा हो जाए. हां अंदर ही अंदर पीठ पीछे खरी-खोटी जरूर सुनाएंगे.

समाज में कई लोग केवल वर्तमान में जीने का और वर्तमान की सोचने तक ही सीमित रहते हैं. कुछ लोग ऐसे होते हैं जो भविष्य को लेकर चलते हैं, गगन भी इन्हीं में से है, वह भारत में पनप रहे विदेशी विचारधारा से चिंतित जरूर था क्योंकि उनका अनुमान था कि इससे भविष्य में उनके विचारधारा पर व्यापक दुष्प्रभाव पड़ेगा. हिंदुस्तान कहे जाने वाले इस देश के नाम केवल नाम मात्र का ही रह जाएगा. लेकिन उन्हें इन सब चीजों से कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि लोग क्या कर रहे हैं. हां जिनके साथ इनका घनिष्ट संबंध, उठना बैठना है कम से कम वह समान विचारधारा का हो क्योंकि अलग अलग विचारधारा के लोगों के रिश्ते अक्सर टूट जाया करते हैं और वह केवल बाहरी दिखावे और आडंबर मात्र के लिए ही रिश्ते रखते हैं. हां अगर कोई जन्मजात और पूर्वजों से उस विचारधारा का अनुसरण करते आ रहे हो तो बात अलग है. ऐसी स्थिति में उनसे भाईचारा बढ़ाना चाहिए और एकता का संदेश देना चाहिए. लेकिन जब कोई अचानक से विचारधारा बदल दे तो बात दिल में खटकती जरूर है.

वैसे भी यहां विदेशी विचारधारा के प्रति लोगों के मन में हीन भावना समाहित है. इससे उनके संस्कृति व परंपरा नष्ट हो जाती है. विचारधारा परिवर्तन के पीछे मानव बुद्धि का भी अहम योगदान है जब वह कुछ नया भयानक चमत्कारिक स्वरूप देखता है और अनुभव करता है और जब पिछले विचारधारा को लेकर गलत साबित करते हुए ब्रेनवाश कर दिया जाता है तो वह इंसान इस ओर शामिल होने से अपने आप को नहीं रोक पाता.

साल है 2020. गगन और दिवाकर का एकाएक मिलना हुआ. किसी भी तरह गगन उससे कहता है, "यह वह दौर है जहां सारे लोकतांत्रिक अथवा धर्म निरपेक्ष देशों में विचारधारा परिवर्तन के लिए जोरों शोरों से प्रचार-प्रसार चल रहा है. यह तभी मुमकिन है जब वह देश विचारधारा निरपेक्ष हो और सभी देशवासियों को किसी विचारधारा को मानने के लिए बाध्य न किया जा सकने वाला हो. रूस, अमेरिका व यूरोप जैसे देशों में भारतीय संस्कृति खासकर हिंदू रीति-रिवाज व सनातन संस्कृति काफी फल-फूल रहा है. वहां के निवासी भारतीय संस्कृति को बखूबी अपना रहे हैं, अपने कष्ट दूर करने व शांति पाने के लिए गीता अध्ययन कर रहे हैं,  श्री कृष्ण भक्ति में लीन हो रहे हैं, हरे राम! हरे राम! राम-राम हरे! हरे!, हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! कृष्णा-कृष्णा हरे! हरे! के मंत्र उपचार उनके जिव्ह्या पर है. हालांकि उनकी भाषा कुछ भी हो हिंदी या संस्कृत श्लोक कंठस्ट आता है.

वहीं भारत में एक विदेशी विचारधारा का प्रचार अपने चरम सीमा तक पहुंच चुकी है. कभी-कभी दुख होता है जब भारत के भोले-भाले लोगों को गुमराह करके उन्हें इस समुदाय में जोड़ने का भरसक प्रयास होता है. हिंदू देवी-देवताओं की तर्ज पर हूबहू अपने ईश्वर को प्रस्तुत करना यह लोगों से धोखा ही है. जैसे कई मंदिरों के परिसर में आस्था स्वरूप लाल फीता बांधने का रिवाज है, यह रिवाज इनके विचारधारा में भी शामिल कर दिए गए हैं ताकि लोगों को भ्रम में रखा जा सके कि वह कुछ बदले नहीं है, क्या बन गए हैं इस चीज का आभास ना हो सके. कुछ जगह तो उनके ईश्वर के चार हाथ वाली मूर्ति और हाथ में त्रिशूल संघ भाला आदि लिए भी देखे गए हैं, मानो वह किसी हिंदू ईश्वर हो. हिंदुओं में देवी चढ़ने के तर्ज पर वे लोग महिलाओं-पुरुषों को ऐसा करने को कहते हैं।

खैर लोगों में यह परिवर्तन स्वाभिक है मामला चाहे विदेश का हो या देश का. लोगों को सभी के विचारधारा का सम्मान करना चाहिए और वही विचारधारा को जारी रखना चाहिए जिसमें उनकी संस्कृति की परीरक्षण हो सके. हां अगर कोई संस्कृति के किसी रिवाज मूल अधिकारों का हनन करती है तो उस रिवाज को त्यागना चाहिए. वैसे भी भारतीयों की आत्मा भारतीय संस्कृति में है ना कि विदेशी संस्कृति में. दूसरे देशों के लोग भारतीयों को हमारी संस्कार की वजह से जानते हैं, चाहे वह दोनों हाथ जोड़कर अभिवादन करने की हो या पैर छूने की या नाम से या पहनावे से (साड़ी, बाली, नथनी चूड़ी) आदि. यकीन मानिए भारतीय महिला की सुंदरता उपरोक्त चीजों को धारण करने से ही है जिसे विदेशी विचारधारा में परहेज किया जाता है. वैसे यह अपनी-अपनी देखने और पसंद करने का मसला है.

भोले-भाले लोग किसी भी तरह दबाव में या बहकावे में या अनजाने में विदेशी विचारधारा अपनाते हैं, वही समझदार लोग और जिनकी बोलचाल ज्यादा हो और विख्याती प्राप्त हो इसे केवल व्यवसाय स्वरूप प्रयोजन करते हैं. व्यवसाय का मतलब अपने ख्याति का फायदा उठाकर अपने अनुयायियों और प्रशंसकों को इसमें जोड़ देते हैं, क्योंकि ऐसा करने से उन्हें अधिक धनराशि प्राप्त होती है. इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है शहरों में बसे ऐसे लोग जो कुछ काम-धंधा तो नहीं करते लेकिन उनके पास बंगला गाड़ी होती है. यह उसके प्रचार करने का ही फल है. यह तो इस विचारधारा के रक्षकों के लिए एक व्यवसाय है जो आज निवेश कर रहे हैं वह कल चल के कई गुना आय दान के रुप में मिलेगा." 

कुछ लोग तो इसमें अजीब-अजीब कारणों से जुड़ते हैं कोई मांसाहारी बनने के लिए, तो कोई अपनी शराब छुड़ाने के लिए, अच्छा है चलो किसी ना किसी का भला तो हो रहा है, इसमें जुड़ने के पीछे कुछ लोग तो यह भी मानते हैं कि इनके ईश्वर माफ कर देते हैं हाहाहा. इसमें सिर्फ मानसिक समस्याएं जैसे- चिड़चिड़ापन, मानसिक तनाव, शराब छुड़ाना, चिंता, नींद और दिमाग का अस्थिर होना आदि समस्याओं को मनोवैज्ञानिक ढंग से कुछ हद तक ठीक किया जाता है, इस विचारधारा की आड़ में. यह समस्याएं लेकर वही लोग जाते हैं जिन्होंने अपने पिछले विचारधारा को समझा ही नहीं है, अपने मंदिर में कभी मन लगाकर पूजा-पाठ नहीं किया, पवित्र ग्रंथ नहीं पढ़ा, पवित्र पुस्तक नहीं पढ़ा और ना ही मन से प्रार्थना किया जो वहां जाकर करते हैं. अगर यह सब विधान से यहां पूजा अर्चना करते तो वहां जाने की नौबत ही नहीं आती। दिवाकर निःशब्द और मौन है।
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